अप्रैल की बारह तारीख को जब यह खबर मिली कि आशा ताई नहीं रहीं तो विश्वास नहीं हुआ। वे सुरों की संभावना ही नहीं, अद्भुत …
( दो प्रवक्ता विद्यालय में सुबह के खाली समय में पुस्तकालय में बातचीत करते हुए। प्रज्ञा समाजशास्त्र विनीता मनोविज्ञान प्…
*युद्ध नहीं समाधान* धधकती धरती की साँसों में बारूद की गंध है, आकाश भी आज जैसे रोता हुआ निर्जन छंद है। मानवता की आँखों म…
एक छोटे से गांव में सिया नाम की लड़की रहती थी। उसका घर मिट्टी का बना था। दीवारों पर समय की गहरी दरारें थीं और छत बारिश …
आधुनिक भारत की लंबी और बेचैन कथा में बहुत कम दृश्य-इतिहासकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने रघु राय जैसी नैतिक स्पष्टता, भावनात्…
24 दिसंबर की सर्द सुबह थी। मैं अपनी बहनों, बेटे मानित और भांजे वंश के साथ बांके बिहारी गली में खड़ी थी। भीड़ इतनी कि पै…
मैं कौन हूँ, क्या नाम मेरा, बस इतना जानो 'मज़दूर' हूँ, सम्मान मिला जो आज मुझे, मैं खुद भी उससे हैरान हूँ। कहते …
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